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लो-वोल्टेज और बिजली कटौती से परलकोट के 15 गाँवों के किसान परेशान, सूख रही मक्का की फसल, क्या यही है डबल इंजन सरकार की रफ्तार?
पखांजुर@7 मार्च/ परलकोट क्षेत्र के बांदे इलाके के लगभग 15 गाँवों के किसान इन दिनों गंभीर बिजली संकट से जूझ रहे हैं। लगातार लो-वोल्टेज और बिजली कटौती के कारण रबी सीजन में बोई गई मक्का की फसल पानी के अभाव में सूखने लगी है। इससे किसानों के सामने भारी आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
आदिवासी छात्र युवा संगठन के अध्यक्ष राजेश नुरूटी ने कहा कि क्षेत्र के अधिकांश गरीब किसान बैंकों से कर्ज लेकर मक्का की खेती करते हैं। उनकी उम्मीद रहती है कि फसल से परिवार का जीवनयापन होगा, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई चलेगी और बैंक का कर्ज भी चुका पाएंगे। लेकिन बिजली की अनियमित आपूर्ति और लो-वोल्टेज की समस्या ने किसानों की मेहनत पर संकट खड़ा कर दिया है। खेतों तक पर्याप्त पानी नहीं पहुंच पा रहा है, जिसके कारण खड़ी फसल बर्बादी की कगार पर पहुंच गई है।
उन्होंने कहा कि किसान अपनी समस्या को लेकर आवाज उठा रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज को गंभीरता से सुनने के बजाय दबाने की कोशिश की जा रही है। यदि जल्द समाधान नहीं किया गया तो किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
राजेश नुरूटी ने कहा कि सरकार किसानों की आय दुगनी करने का दावा करती है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। पूरे छत्तीसगढ़ में धान के समय किसानों को खाद के लिए भटकना पड़ा और धान खरीदी के दौरान भी पंजीकृत किसानों को परेशानियों का सामना करना पड़ा। अब परलकोट क्षेत्र के वही किसान, जो रबी में मक्का की खेती करते हैं, बिजली संकट के कारण अपनी फसल बचाने के लिए जूझ रहे हैं।
उन्होंने कहा कि स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई किसान हताशा में आत्महत्या जैसे कदम की बात करने को मजबूर हो रहे हैं। खेत सूख रहे हैं, किसान चिंतित हैं, लेकिन क्षेत्र के जनप्रतिनिधि और जिम्मेदार अधिकारी मानो इस संकट पर मौन साधे बैठे हैं।
आदिवासी छात्र युवा संगठन के अध्यक्ष राजेश नुरूटी ने सवाल उठाया कि क्या यही है “डबल इंजन” सरकार की रफ्तार? जब किसान को समय पर बिजली, खाद और सम्मान ही नहीं मिलेगा तो किसानों की आय दुगनी कैसे होगी?
उन्होंने सरकार और प्रशासन से मांग की कि परलकोट क्षेत्र के किसानों की समस्या को तत्काल गंभीरता से लेते हुए बिजली आपूर्ति सुचारू की जाए और लो-वोल्टेज की समस्या का स्थायी समाधान किया जाए, ताकि किसानों की खड़ी फसल बच सके और उन्हें आर्थिक बर्बादी से बचाया जा सके। किसानों के दर्द पर चुप्पी नहीं, समाधान चाहिए।
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