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रायपुर/ मंत्री का फोन… लेकिन बिल किसका? नियम गायब, भुगतान पर बवाल; CM सचिवालय तक पहुंचा मामला।

मंत्री का फोन… लेकिन बिल किसका? नियम गायब, भुगतान पर बवाल; CM सचिवालय तक पहुंचा मामला।

बस्तर टाइम्स न्यूज, रायपुर (विनय वर्मा)/ छत्तीसगढ़ सरकार के मंत्री बंगलों में लगे लैंडलाइन टेलीफोन अब बड़े प्रशासनिक विवाद की वजह बन गए हैं। सवाल सिर्फ फोन सुविधा का नहीं, बल्कि उसके वर्षों से किए जा रहे भुगतान का है। चौंकाने वाली बात यह है कि मंत्री आवासों के टेलीफोन बिल लगातार सरकारी खजाने से चुकाए जाते रहे, लेकिन इसके लिए न कोई स्पष्ट शासकीय आदेश मिला है और न ही कोई अधिकृत बजट मद तय है। अब कोषालय (ट्रेजरी) ने भुगतान पर आपत्ति दर्ज कर दी है, जिसके बाद मामला मुख्यमंत्री सचिवालय तक पहुंच गया है।

 ट्रेजरी ने पूछा- किस नियम से हो रहा भुगतान?

सूत्रों के मुताबिक हाल ही में मंत्रालय की टेलीफोन व्यवस्था में बदलाव के दौरान यह तथ्य सामने आया कि मंत्री बंगलों के टेलीफोन बिल सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के माध्यम से चुकाए जा रहे हैं। जब नए बिल भुगतान के लिए ट्रेजरी पहुंचे तो अधिकारियों ने साफ सवाल उठाया कि आखिर किस नियम या शासन के आदेश के तहत यह भुगतान किया जा रहा है। वैधानिक आधार नहीं मिलने पर भुगतान रोक दिया गया और आपत्ति दर्ज कर दी गई।

गृह और GAD के बीच जिम्मेदारी का सवाल

अब इस मुद्दे पर गृह विभाग और सामान्य प्रशासन विभाग के बीच जिम्मेदारी को लेकर असमंजस की स्थिति बन गई है। गृह विभाग मंत्री आवासों का आवंटन करता है, लेकिन टेलीफोन बिल भुगतान की जिम्मेदारी लेने से बच रहा है। वहीं सामान्य प्रशासन विभाग भी यह स्पष्ट नहीं कर पा रहा कि वर्षों से किस आधार पर अपने बजट से यह भुगतान करता रहा।

 हर सुविधा का विभाग तय, लेकिन फोन का नहीं

सरकारी व्यवस्था में मंत्री आवासों से जुड़े अधिकांश खर्च पहले से निर्धारित हैं। आवास आवंटन गृह विभाग करता है, भवन का रखरखाव और बिजली बिल लोक निर्माण विभाग (PWD) वहन करता है, जबकि पानी का बिल लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) के जिम्मे होता है। लेकिन टेलीफोन बिल के लिए किसी विभाग को अधिकृत जिम्मेदारी नहीं दी गई। इसके बावजूद भुगतान लगातार होता रहा।

परंपरा चली, लेकिन आदेश नहीं मिला।

अधिकारियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह व्यवस्था आखिर कब और किसके आदेश से शुरू हुई। अब तक उपलब्ध रिकॉर्ड में ऐसा कोई शासनादेश या वित्तीय स्वीकृति नहीं मिली है, जिससे यह साबित हो सके कि सामान्य प्रशासन विभाग को यह खर्च उठाने का अधिकार दिया गया था। यानी वर्षों तक व्यवस्था परंपरा के भरोसे चलती रही।

 पुराने बिलों का हिसाब कौन देगा?

अब चिंता सिर्फ मौजूदा भुगतान की नहीं, बल्कि पहले किए गए भुगतानों की भी है। यदि भुगतान नियमों के अनुरूप नहीं पाया गया तो लाखों रुपये के पुराने बिलों की जवाबदेही किसकी होगी, यह बड़ा सवाल बन गया है। मंत्रालय में इस बात पर भी चर्चा है कि कहीं किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय करनी पड़ेगी या फिर सरकार इस व्यवस्था को बाद में वैधानिक रूप देकर विवाद समाप्त करेगी।

 CM सचिवालय में समाधान की तलाश।

सूत्रों के अनुसार पूरा मामला अब मुख्यमंत्री सचिवालय के स्तर पर विचाराधीन है। नई व्यवस्था बनाने, टेलीफोन बिल के लिए अलग बजट मद तय करने और भविष्य में वित्तीय आपत्तियों से बचने के लिए स्पष्ट नियम बनाने पर मंथन चल रहा है। साथ ही पुराने भुगतानों को किस प्रकार वैधानिक आधार दिया जाए, इस पर भी गंभीर विचार किया जा रहा है।

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